Class 12th Most Important Questions Sociology In Hindi
स्ववाचक या आत्मवाचक - स्ववाचक या आत्मवाचक से आशय अपने बारे में सोचने तथा अपनी दृष्टि को लगातार अपनी तरफ घुमाने की क्षमता से है । इस क्षमता के लिए आवश्यक है कि आत्मनिरीक्षण आलोचनात्मक होना चाहिए । इसमें समीक्षा अधिक और आत्म - मुग्धता कम होनी चाहिए ।
उपनिवेशवाद - उपनिवेशवाद से आशय उस विचारधारा से है । जिसको व्यवहार में लाकर कोई देश किसी अन्य देश को बलपूर्वक जीतने तथा वहाँ अपना उपनिवेश स्थापित करने का प्रयास करता है । उपनिवेश स्थापित करने वाला देश वहाँ का शासक बन बैठता है ।
राष्ट्र - ' राष्ट्र ' से आशय जनसंख्या के उस समूह से हैं जो अपने आप को एक समुदाय के रूप में प्रस्तुत करता है तथा अनेक साझा विशिष्टताओं पर आधारित होता है । इस प्रकार की मुख्य विशिष्टताएँ है — सामान्य भाषा , एक निश्चित भौगोलिक स्थिति , इतिहास , धर्म , प्रजाति तथा राजनीतिक आकांक्षाएँ ।
राष्ट्र - राज्य - राष्ट्र - राज्य ( Nation - State ) से आशय उस विशिष्ट प्रकार के राज्य से है जो आधुनिक जगत की विशेषताओं वाला है । इस राज्य की सरकार की एक निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र पर सम्प्रभुता होती है तथा उस क्षेत्र में रहने वाले लोग उस राज्य के नागरिक माने जाते हैं ।
राष्ट्र - राज्य के ये सभी नागरिक स्वयं को उस एकल राष्ट्र का हिस्सा मानते हैं । राष्ट्र - राज्य का घनिष्ठ सम्बन्ध राष्ट्रीयता के उदय से है , भले ही राष्ट्रवादी निष्ठाएँ सदैव उनके विशिष्ट राज्यो , जो आज विद्यमान है , की परिसीमाओं के अनुरूप नहीं होती । वर्तमान समय में विश्व के सभी भागों में राष्ट्र - राज्य ही विद्यमान है ।
प्रश्न । भारतीय समाज की मौलिक विशेषताओं की विवेचना कीजिए । अथवा भारतीय समाज का परिचय इसकी किन विशेषताओं द्वारा दिया जा सकता है ? विस्तार से समझाइए ।
उत्तर- प्रत्येक समाज को अपनी कुछ मौलिक विशेषताएं होती है । भारतीय समाज एक प्राचीन समाज है । इतिहासकारों ने इस समाज का लगभग पिठले 5000 वर्षों का इतिहास लिपिबद्ध किया है । ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में कालों में विभाजित कर सकते है - प्राचीनकाल ( लगभग 3000 ईसा पूर्व से 700 भारतीय समाज को ३० तक ) , मध्यकाल ( 701 ई ० से 1750 ई ० तक ) , आधुनिक काल ( 1761 ई . से 1947 ई ० तक ) एवं समकालीन काल ( 1947 ई ० से आज तक ) । यह काल विभाजन विश्लेषण को सरलता की दृष्टि से किया गया है अन्यथा काल - प्रवाह को किसी भी तरह निश्चित अवधियों में नहीं बाँटा जा सकता क्योकि प्रत्येक युग में पिछले युग के तत्त्व भी सम्मिलित होते हैं और यह भावी युग की सम्भावनाओ को भी अपने में संजोए होता है । प्राचीन भारत का लगभग 4000 वर्ष का इतिहास एक दीर्घकालीन सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया को प्रकट करता है जिसमें भारतीय समाज की मूल परम्पराएं पूर्ण रूप से विकसित हुई । वैदिक संस्कृति के इसी युग में हिन्दू सामाजिक संगठन की सस्थागत आधारशिलाएँ एवं वैचारिक मान्यताएं भी विकसित हुई । वर्ण व्यवस्था , आश्रम व्यवस्था , जाति व्यवस्था , पितृसत्ता , लिंग विभेदीकरण आदि हिन्दू सामाजिक संगठन की प्रमुख संस्थागत आधारशिलाएँ है । धर्म , कर्म , पुनर्जन्म , पुरुषार्थ तथा प्रकृति एवं संस्कार इसकी प्रमुख वैचारिक मान्यताएं है । मध्यकाल तथा आधुनिक काल में इन संस्थागत आधारशिलाओं में अत्यधिक परिवर्तन हुआ है , परन्तु इनका महत्त्व , किसी न किसी रूप में , समकालीन भारतीय समाज में भी बना हुआ है । भारत के भौगोलिक परिदृश्य ने इसके इतिहास के निर्माण में निर्णायक भूमिका का निर्वाह किया है । के ० एम ० पणिक्कर ( K M Panikkar ) के अनुसार , " भारत के भूगोल , इसके प्राकृतिक संकुल , इसके पर्वतो और नदियों ने किसी अन्य देश की अपेक्षा भारत के इतिहास को कहीं अधिक प्रभावित किया है । " उत्तर में अभेद्य हिमालय की ऊंची पर्वतमालाएँ इसकी प्रहरी रही है जो इसे एशिया महाद्वीप से पृथक करती हैं । दक्षिण में एक पठारौ हिस्सा है जो तीन तरफ से हिन्द महासागर से घिरा हुआ है । पश्चिम में अरब सागर एवं पूर्व में बंगाल की खाड़ी के नाम से यही महासागर भारत के सामुद्रिक महत्त्व को प्राचीन काल से बनाए हुए है । इस भांति , प्रारम्भिक काल से ही भारत एक पृथक् भू भाग रहा है जिसने उसके निजी जीवन एवं सभ्यता के विकास में बहुत योगदान दिया है । भारत का विशाल आकार इसे एक उपमहाद्वीप को सज्ञा दिया जाना तर्कसंगत बनाता है । इसी प्रकार , भारतीय उपमहाद्वीप को प्राकृतिक विविधता ने भी भारतीय समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभायी है । प्रत्येक प्रकार की जलवायु यहाँ विद्यमान है । राजपूताना के तपते हुए रेगिस्तान , हिमालय की बर्फ से ढकी रहने वाली उच्च चोटियां , गंगा यमुना का विस्तृत मैदान , बंगाल और मालाबार की ट्रोपिकल जलवायु एवं दक्षिणी पठार की सूखी पहाड़ियों वाली भूमि ने इसे सामाजिक , सांस्कृतिक विविधता प्रदान की है । मूल रूप से भारतीय मनीषि भारत की दो देशो के रूप में कल्पना करते थे - एक उत्तरी भारत जिसे आर्यावर्त कहा जाता था और दूसरा विन्ध्याचल पर्वत से पार दक्षिण पथ कहलाता था । बाद में अगस्त्य ऋषि ने विन्ध्याचल को पार किया और पूरे दक्षिण पथ को आर्य संस्कृति के साथ बांधने का प्रयास किया । राम का वन गमन भी इस सांस्कृतिक एकीकरण का प्रयास कहा जा सकता है । तयों से हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक सम्पूर्ण भारत की अवधारणा भारतीयों के जनमानस में सदा से रही है ।